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Bundelkhand Ek Rajya
विंध्य क्षेत्र बुंदेलखंड (bundelkhand) का इतिहास बड़ा प्राचीन है प्राचीन काल में बुंदेलखंड (bundelkhand) क्षेत्र पहाड़ी पठारी रहा है। जिनके शैल शिखरों में निर्मित गुफाओं में, आश्रमों में ऋषि मुनि तपश्या किया करते थे, जालौन में जालव ऋषि थे तो कालपी में व्यास ऋषि का आश्रम था। चित्रकूट काजिंजर के पास वाल्मिकि ऋषि रहते थे। नर्मदा के तट का ब्राहम्ण धाट प्रसिद्ध है। जहा ब्रम्हा जी तप किया करते थे। इस प्रकार प्राचीन काल में बुंदलेखंड(bundelkhand) तपस्वीयों की तपो भूमि थी। कालांतर में यहा चेदी राजाओं का राज रहा जो चिदी वंश के थे। तत्पश्चात् नागों का राज्य रहा जिनकी राजधानी नागाभद्र नागौद थी। नागराजा शैव भक्त थे नाग राज्य कला, संस्कृति में उच्च कोटि का था। इनकी सत्ता सिंधु नदी के किनारे शिवपुरी क्षेत्र की थी। सिंधु के किनारे पर पवा इनकी दूसरी राजधानी थी। रामायण काल में यह क्षेत्र रामचंद्र जी के पुत्र कुश के आधीन था, जिसकी राजधानी कुशावती थी वर्तमान में कालिंजर के नदी के पश्चिमी किनारे लव पुरी थी जो रामचंद्र जी के ज्येष्ठ पुत्र लव के आधीन थी वर्तमान में लौढी महा भारत काल में इस क्षेत्र में कर्वी नगर करूषपुरी के नाम से विख्यात था जहा दलाकी–मलाकी राजाओं का राज्य था तो विराट नगरी भी इसी बुंदेलखंड (bundelkhand) में थी जिसे वर्तमान में राठ कहा जाता है। भगवान कृष्ण के मौसेरे भाई राजा शिशुपाल चंदेरी में राजा थे तो दंतवा के नाम से दतिया प्रसिद्ध था। सेवड़ा जो सिंधु नदी के तट पर है यहा ब्रम्हा के पुत्रों ने तपस्या की थी।
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